संसार के हर धर्म में दान को महत्त्व दिया गया है और इसके लिए नियम बनाए गए हैं। दान करने से न केवल धर्म का पालन होता है, बल्कि व्यक्ति जीवन की तमाम समस्याओं से भी मुक्ति पाता है। दान कई प्रकार के होते हैं जैसे अन्न, वस्त्र, चिकित्सा का दान, भूमि का दान, विद्या का दान, सेवा का दान आदि। दान करना शुभ और कल्याणकारी होता है, परन्तु इसके लिए कुछ बातों का ख्याल जरूर रखना चाहिए।संसार के हर धर्म में दान को महत्त्व दिया गया है और इसके लिए नियम बनाए गए हैं। दान करने से न केवल धर्म का पालन होता है, बल्कि व्यक्ति जीवन की तमाम समस्याओं से भी मुक्ति पाता है।
पृथ्वी पर कर्म से ही हमारे पाप और पुण्य का लेखा-जोखा तैयार होता है। श्री कृष्ण ने कहा कि संसार में कोई भी जीव एक पल भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता है। इसलिए जाने अनजाने कभी न कभी हम सभी पाप कर्म कर बैठते हैं। और पाप कर्मों से मुक्ति के लिए भी कर्म करना पड़ता है।
शास्त्रों में कई ऐसे उपाय यानी कर्म बताए गये हैं जिनसे पाप कर्मों के प्रभाव से मुक्ति मिल सकती है। ऐसा ही एक कर्म है माघ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत। इस एकादशी को षटतिला एकादशी के नाम से जाना जाता है। अपने नाम के अनुसार इस एकादशी में छः प्रकार से तिल का उपयोग करना श्रेष्ठ बताया गया है।
कथा आज की नहीं बल्कि पुरानी और इसका उल्लेख पुराणों में है। कथा के अनुसार वैवस्वत मनु के पुत्र थे राजा इल। इल एक बार शिकार खेलने वन में गए। अनजाने में ही वह अम्बिका नामक वन में पहुंच गए।
अम्बिका वन भगवान शिव द्वारा शापित था। एक बार शिव और पार्वती इस वन में विहार कर रहे थे उसी समय ऋषियों का एक समूह वन में आ पहुंचा।
इससे पार्वती शर्मा गईं। शिव जी को ऋषियों का अचानक वन में प्रवेश करना अच्छा नहीं लगा और उन्होंने शाप दे दिया कि, शिव परिवार के अलावा अम्बिका वन में जो भी प्रवेश करेगा वह स्त्री बन जाएगा।
सृष्टि के आरंभ से ही कार्तिक पूर्णिमा इसलिए है खास
सृष्टि के आरंभ से ही एक तिथि बड़ी ही खास रही है। यह तिथि है कार्तिक पूर्णिमा। इसका महत्व सिर्फ वैष्णव भक्तों के लिए ही नहीं शैव भक्तों के लिए भी है। पुराणों की कथा के अनुसार भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक महाबलशाली असुर का वध इसी दिन किया था।
इससे देवगण बहुत प्रसन्न हुए और भगवान विष्णु ने शिव जी को त्रिपुरारी नाम दिया जो शिव के अनेक नामों में से एक है। विष्णु के भक्तों के लिए यह दिन इसलिए खास है क्योंकि भगवान विष्णु का पहला अवतार इसी दिन हुआ था। प्रथम अवतार में भगवान विष्णु मत्स्य यानी मछली रूप में थे।
भगवान को यह अवतार वेदों की रक्षा, प्रलय के अंत तक सप्तऋषियों, अनाजों एवं राजा सत्यव्रत की रक्षा के लिए लेना पड़ा था। इससे पुनः सृष्टि का निर्माण कार्य आसान हुआ।
शिव ताण्डव स्तोत्र (शिवताण्डवस्तोत्रम्) हिंदू परंपरा में प्रशंसा की एक भजन है कि शिव की शक्ति और वर्णन करता है
शिव ताण्डव स्तोत्र (संस्कृत:शिवताण्डवस्तोत्रम्) महान विद्वान एवं परम शिवभक्त लंकाधिपति रावण द्वारा विरचित भगवान शिव का स्तोत्र है।
शिवताण्डव स्तोत्र स्तोत्रकाव्य
में अत्यन्त लोकप्रिय है। यह पञ्चचामर छन्द में आबद्ध है। इसकी अनुप्रास
और समास बहुल भाषा संगीतमय ध्वनि और प्रवाह के कारण शिवभक्तों में प्रचलित
है। सुन्दर भाषा एवं काव्य-शैली के कारण यह स्तोत्र विशेषकर शिवस्तोत्रों
में विशिष्ट स्थान रखता है।
श्री हनुमान जी की स्तुति जिसमें उनके बारह नामों का उल्लेख मिलता है इस प्रकार है :
हनुमानद्द्रजनीसूनुर्वायुपुत्रो महाबलः। रामेष्टः फाल्गुनसखः पिङ्गाक्षोऽमितविक्रमः॥ उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशनः। लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा॥ एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मनः। स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च यः पठेत्॥ तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भवेत्।
(आनंद रामायण 8/3/8-11)
उनका एक नाम तो हनुमान है ही, दूसरा अंजनी सूनु, तीसरा वायुपुत्र, चौथा महाबल, पांचवां रामेष्ट (राम जी के प्रिय), छठा फाल्गुनसख (अर्जुन के मित्र), सातवां पिंगाक्ष (भूरे नेत्र वाले) आठवां अमितविक्रम, नौवां उदधिक्रमण (समुद्र को लांघने वाले), दसवां सीताशोकविनाशन (सीताजी के शोक को नाश करने वाले), ग्यारहवां लक्ष्मणप्राणदाता (लक्ष्मण को संजीवनी बूटी द्वारा जीवित करने वाले) और बारहवां नाम है- दशग्रीवदर्पहा (रावण के घमंड को चूर करने वाले) ये बारह नाम श्री हनुमानजी के गुणों के द्योतक हैं। श्रीराम और सीता के प्रति जो सेवा कार्य उनके द्वारा हुए हैं, ये सभी नाम उनके परिचायक हैं और यही श्री हनुमान की स्तुति है। इन नामों का जो रात्रि में सोने के समय या प्रातःकाल उठने पर अथवा यात्रारम्भ के समय पाठ करता है, उस व्यक्ति के सभी भय दूर हो जाते हैं।